गुरुवार, 23 अगस्त 2007

दिव्य प्रेम सेवा मिशन के १० वर्ष..........

दिव्य प्रेम सेवा मिशन ने आपनी स्थापना के १० वर्ष पूरे केर लिए है। जनुअरी १९९७ को हरिद्वार के चंदिघात की एक झोपड़ी से शुरू हुआ कुष्ठ सेवा का यह संकल्प आज सौकरो बच्चो के साथ साथ समाज मे सेवा और साधना का वाहक बन रह है । ह्रदय मे करुना और मन मे संकल्प ही तो आधार था आशीष जीं का , और उसमे शामिल हुई समाज की संवेदना ,क्योकि उनका यह संकल्प अपने लिए नही वरन स्वार्थ की इस दुनिया से परे हट कर उस परमार्थ के लिए था , जिसमे सेवा ही साधना थी और यही साधना सम्बोधि तक पहुचने का मार्ग था।
दिव्य प्रेम सेवा मिशन ने समाज के सबसे घ्रिदित समझे जाने वाले, समाज से कट कर जीने वाले कुस्थ रोगियों की सेवा का व्रत लिया । हरिद्वार मे "सेवाकुंज" तथा "वन्देमत्रमकुंज" परिसर के माध्यम से कुस्था रोगियों की चिकित्सा तथा उनके २०० स्वस्थ बच्चो के बीच शिक्चा संस्कार के मध्यम से नवजीवन प्रदान कर उनमे जीवन के प्रति आशा और उल्लाश का संचार तो किया ही है साथ ही वे तथाकथित सभ्य समाज मे इनके प्रति कुंद हुई संवेदना को भी जगाने से नही चुके है जिसका परिणाम है जिन नौजवानों को उच्च्रिखाल और दिशाहीन कहा जाता है आज वही नौजवान विश्वविद्यालय से निकलकर कुस्थ रोगियों की झोपदियो मे सेवा रत है।
दिव्य प्रेम सेवा मिशन की १० वर्षो की यात्रा पेर मानवता के नाते इन उपेच्च्हित दीं हीन रोगियों एवम इनके परिवारों के प्रति हम आपनी संवेदना का दीप जलाए क्योकि यह लडाई केवल शारीरिक रुप से पीड़ित उन व्यक्तियों तक ही सीमित नही है अपितु उस मानसिक कोढ़ के भी खिलाफ है जो आज समाज मे चिन्तन के स्तर पेर पूरी तरह व्याप्त है............

कोई टिप्पणी नहीं: