शुक्रवार, 10 अगस्त 2007

परिवर्तन के दौर मे........................

मानव का क्या कोई नियत लक्ष्य है ? अथवा मानव की यात्रा एक निरर्थक भ्रम मात्रा है ? मानव ने शरीर को मैं मानकर उसी के अर्थ मे अपनी परम्परा बनाली है......शरीर विकाश का क्रम अभी चल रह है...निरंतर सुख से जीने की परम्परा अभी बन नही पायी है मनुष्य सुखधर्मी है ,वह निरंतर सुख से जीना चाहता है...... भ्रमवश अभी मनुष्य दिखावे व भुलावे को ही सुख मानकर चल रहा है.................परंतु मनुष्य का स्वाभाव इस प्रकार का है कि उससे सम्बंधित प्रश्नों पेर गहरे से विचार कर उसका उत्तर पाये बिना सन्तुष्ट नही रहा जा सकता । महान और गौरव मय भविष्य के प्रति श्रद्धा और विश्वाश उसमे जन्म जात और प्राकृत प्रदत्त है,वह सुखद और सुनहरे भविष्य मे आशा संजोये बिना नही रह सकता इतिहास के panno मे मनुष्य का सारा sangharsh इसी आशा से prerit है tatha उसका उद्देश्य इसे थोश जीवन मे अनुभव के धरातल per utarta hai........

2 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

hello.............sanjay jee kya hall hai..........are kuchh jordar likhiye.aapko mai sewa jyoti me padhta rahta hu........aapka fan hu....aapke kaam ke baare me bahut suna hai........kabhi aana hai haridwar........ram kumar singh gazia bad

Sanjay Tiwari ने कहा…

अच्छा प्रयास है. आगे बढ़ाईये.