बुधवार, 22 अगस्त 2007

सार्थकता ..........................

मै ऐसा महासूश करता हूँ की जीवन एक बहुत संवेदनशील वस्तु है। उसे कोई मजाक, खिलवाड़ या "ऐसे ही" करने वाले कार्यो मे कोई रूचि नही होती है,परंतु जन्म से ही समाज कोई दिशा कोई कार्यकरेम दे नही पाटा । जीवन को हम विभिन्न तरह के दिखावे भुलावे मे क़ैद करने का प्रयाश करते है और युवावस्था आते आते जीवन स्वतंत्र विचरण करना भूल जाता है। वह स्वयम आपनी ही क़ैद मे आ जाता है। ऐसी ऐसे निर्णय हो चुके होते है ऎसी मन्याताये पुष्ट हो जाती है, ऐसे विचार हावी हो जाते है, ऎसी समाज की एक परिकल्पना बन जाती है कि न्यायोचित कार्यक्रमों को करने मे स्वयम को सच्छाम नही पाता। आधिकतेर तो होश ही नही रहता कि क्या सही है क्या गलत? और अगर होश आ भी जाता तो उस मान्यता की तीव्रता ऎसी होती है कि ना चाहा हुआ भी हो जाता है व चाहा हुआ भी नही हो पाता । ऎसी स्तिथी मे आपने आदत को बदलने के लिए सजगता वा चिन्तन ही उपाय दिखते है। बारम्बार चिन्तन द्वारा बात की सच्चाई को परखते रहें वा आपने कार्यक्रेमो निर्णयों के प्रति सजग रहे। ऐसा लगत है कि इससे एक छात्पताहत पैदा होगी और कुछेक गहरी मान्यताओं को छोड़ बाकी आदत बदल जायेंगे । जितना जितना हम सार्थाक्ताओं की ओर ध्यान देंगे उतना उतना ही निरार्थाक्तायें कम हो जायेंगी सजग रहते हुए ही आपनी सार्थकता को पहचानना ही एकमात्र उपाय दीखता है ....................................... अगर इसमे आपको कोई आन्य अनुभव या विचार आएंगे तो हम उसका सम्मान करेंगे.......और वह परस्पर्तामे भी सहायक होंगे..........धन्यवाद

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