दिव्य प्रेम सेवा मिशन ने आपनी स्थापना के १० वर्ष पूरे केर लिए है। जनुअरी १९९७ को हरिद्वार के चंदिघात की एक झोपड़ी से शुरू हुआ कुष्ठ सेवा का यह संकल्प आज सौकरो बच्चो के साथ साथ समाज मे सेवा और साधना का वाहक बन रह है । ह्रदय मे करुना और मन मे संकल्प ही तो आधार था आशीष जीं का , और उसमे शामिल हुई समाज की संवेदना ,क्योकि उनका यह संकल्प अपने लिए नही वरन स्वार्थ की इस दुनिया से परे हट कर उस परमार्थ के लिए था , जिसमे सेवा ही साधना थी और यही साधना सम्बोधि तक पहुचने का मार्ग था।
दिव्य प्रेम सेवा मिशन ने समाज के सबसे घ्रिदित समझे जाने वाले, समाज से कट कर जीने वाले कुस्थ रोगियों की सेवा का व्रत लिया । हरिद्वार मे "सेवाकुंज" तथा "वन्देमत्रमकुंज" परिसर के माध्यम से कुस्था रोगियों की चिकित्सा तथा उनके २०० स्वस्थ बच्चो के बीच शिक्चा संस्कार के मध्यम से नवजीवन प्रदान कर उनमे जीवन के प्रति आशा और उल्लाश का संचार तो किया ही है साथ ही वे तथाकथित सभ्य समाज मे इनके प्रति कुंद हुई संवेदना को भी जगाने से नही चुके है जिसका परिणाम है जिन नौजवानों को उच्च्रिखाल और दिशाहीन कहा जाता है आज वही नौजवान विश्वविद्यालय से निकलकर कुस्थ रोगियों की झोपदियो मे सेवा रत है।
दिव्य प्रेम सेवा मिशन की १० वर्षो की यात्रा पेर मानवता के नाते इन उपेच्च्हित दीं हीन रोगियों एवम इनके परिवारों के प्रति हम आपनी संवेदना का दीप जलाए क्योकि यह लडाई केवल शारीरिक रुप से पीड़ित उन व्यक्तियों तक ही सीमित नही है अपितु उस मानसिक कोढ़ के भी खिलाफ है जो आज समाज मे चिन्तन के स्तर पेर पूरी तरह व्याप्त है............
गुरुवार, 23 अगस्त 2007
बुधवार, 22 अगस्त 2007
स्वदेशी और पुरातनता.............
स्वदेशी की जब हम बात करते है तो उसकी जीवंत भावना रेलवे और कार से लौटकर पुराने ज़माने के रथ और bailgadhi को apanana नही है। जब हम राष्ट्रीय sikchha kee बात करते है तो भास्कर के khagolvighyan और गादित अथवा नालंदा वयस्था kee oor लौटना आवश्यक नही है। हमे स्वयम से जुडे और मुख्य मुद्दे से काम है, यहाँ प्रश्न आधुनिकता और पुरातनता के बीच का नही है बल्कि एक आयातित सभ्यता और भारतीय मानस और प्रकृति के बीच अंतर संबंध का है.यह संघर्ष वर्त्तमान और अतीत का नही है बल्कि वर्तमान और भविष्य के बीच की संभावनाओं का है। विदेशी भाषा, जीवन, विचार, और संस्कृति को जानकर उनका उपयोग करे उनसे सहायता प्राप्त करे , तथा आपने आसपास की दुनिया के साथ यही संबंध स्थापित कर सके क्योकि पश्चिम की वैघ्यानिक तार्किक, प्रगतिशील संस्कृत आब विघटन की प्रक्रिया मे है और इस छाड़ डूबी नाव पेर सवार होना हमारे लिए बेतुकापन होगा। पश्चिम के बुद्धिजीवी भी एक नयी आशा से भारत की ऊर देख रहे है, यदि हम आपने गौरवशाली आतीत और सामर्थ्य को त्याग कर यूरोप के विघत्न्शील और मृतप्राय ateet मे aapana vishwash बनाए rakhenge तो यह bade aascharya की बात होगी........आपके suvichar की praatichha रहेगी........................
सार्थकता ..........................
मै ऐसा महासूश करता हूँ की जीवन एक बहुत संवेदनशील वस्तु है। उसे कोई मजाक, खिलवाड़ या "ऐसे ही" करने वाले कार्यो मे कोई रूचि नही होती है,परंतु जन्म से ही समाज कोई दिशा कोई कार्यकरेम दे नही पाटा । जीवन को हम विभिन्न तरह के दिखावे भुलावे मे क़ैद करने का प्रयाश करते है और युवावस्था आते आते जीवन स्वतंत्र विचरण करना भूल जाता है। वह स्वयम आपनी ही क़ैद मे आ जाता है। ऐसी ऐसे निर्णय हो चुके होते है ऎसी मन्याताये पुष्ट हो जाती है, ऐसे विचार हावी हो जाते है, ऎसी समाज की एक परिकल्पना बन जाती है कि न्यायोचित कार्यक्रमों को करने मे स्वयम को सच्छाम नही पाता। आधिकतेर तो होश ही नही रहता कि क्या सही है क्या गलत? और अगर होश आ भी जाता तो उस मान्यता की तीव्रता ऎसी होती है कि ना चाहा हुआ भी हो जाता है व चाहा हुआ भी नही हो पाता । ऎसी स्तिथी मे आपने आदत को बदलने के लिए सजगता वा चिन्तन ही उपाय दिखते है। बारम्बार चिन्तन द्वारा बात की सच्चाई को परखते रहें वा आपने कार्यक्रेमो निर्णयों के प्रति सजग रहे। ऐसा लगत है कि इससे एक छात्पताहत पैदा होगी और कुछेक गहरी मान्यताओं को छोड़ बाकी आदत बदल जायेंगे । जितना जितना हम सार्थाक्ताओं की ओर ध्यान देंगे उतना उतना ही निरार्थाक्तायें कम हो जायेंगी सजग रहते हुए ही आपनी सार्थकता को पहचानना ही एकमात्र उपाय दीखता है ....................................... अगर इसमे आपको कोई आन्य अनुभव या विचार आएंगे तो हम उसका सम्मान करेंगे.......और वह परस्पर्तामे भी सहायक होंगे..........धन्यवाद
मंगलवार, 21 अगस्त 2007
आजाद भारत के छः दशक ..........
आजादी के छः दशक बाद भारत के विकाश के बारे मे कई मंचों से आनेक प्रकार की चर्चाएँ चल रही है। परंतु भारत के आब तक के विकाश पेर जब हम दृष्टि डालते है तो कोई स्पष्ट चित्र नही उभरता जिससे हम देश के भविष्य के बारे मे उत्साहित हो या भयभीत हो। इसमे संदेश नही कि कई मायने मे हम आज उस स्तिथी से कही बेह्तेर हैजो आज़ादी का सुरज उगने के समय थी। भारतीय अर्थ्वयास्था अपने शीर्ष दौर मे है। सेंसेक्स लगातार बढ़ रह है । करीब ८ प्रतिशत के रफ़्तार से बढती अर्थ्वायास्था मे सिर्फ एक ठेलिफों कम्पनी भारती ऐर्तेल के पास ही २.५० करोरः ग्राहक है,ये संख्या बहुत सारे यूरोपीय देशो की जनसंख्या से ज्यादा है............नै अर्थावयास्था की प्रतिनिधी कम्पनी इन्फोसिस मे जिन लोगो ने १९९३ मे १०,००० रूपये लगाए थे वे अब २करोर् रुपये से ज्यादा के मालिक है............हाल मे नाभिकीय और अंतरिक्ष कार्यक्रम , संचार क्रान्ति तथा सुचना क्रान्ति मे जो नए प्रतिमान स्ताथापित किये गए है उसने देशको विश्य्व को अग्रणी देशो मे स्थान दिला दिया है । लेकिन इस तथ्य के विपरीत एक तथ्य यह भी है कि पिचले पांच वर्षो मे लगभग १ लाख किसानो ने आर्थिक तंगी के कारण आत्महत्या करने के लिए विवश हो चुके है। भारत मे ३० करोर लोग गरीबी रेखा के नीचे है,आज भी देश मे दुनिया मे सबसे आधिक गरीब आशिखित और कुपोषित लोग रहते है। कम क्रय शक्ति के कारण देश के २५ करोड़ लोग हेर दिन भूखे पेट सोते है,जहाँ तक आर्थिक सम्पन्नता की बात है तो तथ्य ये भी है कि देश की १०० करोड़ आबादी मे से केवल २० लाख लोग ही आयाकेर्दाता है। दुनिया के भ्रस्त देशो मे भारत शीर्ष स्थान पर है । आतंकवाद ,उग्रवाद और नक्सली हिन्षा ने देश के एक बडे हिस्से मे माहौल को रक्तमय बाना रखा है। इस समग्र स्तिथी मे जो बात सबसे अधिक कष्ट की है कि भारत उन गुणों से भी दूर होता जा रहा है ,जो भारत की पहचान हुआ करती थी। प्राचीन घ्यान ,श्रेस्थ मानवीय गुन , सूहर्द और वसुधैव कुटुम्बकम की अतुलनीय भावना हमारी पहाचां थिजो आज के सार्वजनिक जीवन मे दुर्लभ है। अगर हम आपने प्राचीन गौरव को पूना तलाशे और इस देश को सांस कृत व सामजिक ताने बाने पेर लग चुकी जंग को साफ केर आपने राजनीतिक और प्रशाशानिक संगठनो को नै प्रेरणा प्रदान केर सके तो निश्चित रुप से भारत सही आर्थो मे आपने महान भविष्य के प्रति आश्वस्त हो सकता है। .............................
शुक्रवार, 10 अगस्त 2007
परिवर्तन के दौर मे........................
मानव का क्या कोई नियत लक्ष्य है ? अथवा मानव की यात्रा एक निरर्थक भ्रम मात्रा है ? मानव ने शरीर को मैं मानकर उसी के अर्थ मे अपनी परम्परा बनाली है......शरीर विकाश का क्रम अभी चल रह है...निरंतर सुख से जीने की परम्परा अभी बन नही पायी है मनुष्य सुखधर्मी है ,वह निरंतर सुख से जीना चाहता है...... भ्रमवश अभी मनुष्य दिखावे व भुलावे को ही सुख मानकर चल रहा है.................परंतु मनुष्य का स्वाभाव इस प्रकार का है कि उससे सम्बंधित प्रश्नों पेर गहरे से विचार कर उसका उत्तर पाये बिना सन्तुष्ट नही रहा जा सकता । महान और गौरव मय भविष्य के प्रति श्रद्धा और विश्वाश उसमे जन्म जात और प्राकृत प्रदत्त है,वह सुखद और सुनहरे भविष्य मे आशा संजोये बिना नही रह सकता इतिहास के panno मे मनुष्य का सारा sangharsh इसी आशा से prerit है tatha उसका उद्देश्य इसे थोश जीवन मे अनुभव के धरातल per utarta hai........
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