बुधवार, 16 जुलाई 2008
मै सोचता हु.............
इस शहर की भीड़ में एक पहचान बनाने निकला हू,कही टुटा है एक तारा आसमान से मैं उसे चाँद बनाने निकला हू..... तो क्या हुआ जो जिंदगी हर कदम पर मारती है ठोकर,हर बार फिर संभलकर मैं उसे फिर एक अरमान बनाने निकला हू....... डूबता हुआ सूरज कहता है हर शाम मुझेसे की वो कल फिर आएगा ,मैं उसे कल के लिए एक आसमान बनाने निकला हू......... एक तारा टुटा है असमान मे मैं उसे चाँद बनाने निकला हू ............
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2 टिप्पणियां:
bahut Sundar!
इस शहर की भीड़ में
एक पहचान बनाने निकला हू,
कही टुटा है एक तारा आसमान से
मैं उसे चाँद बनाने निकला हू.....
bahut badhiya. likhte rahe.
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