बुधवार, 16 जुलाई 2008

मै सोचता हु.............

इस शहर की भीड़ में एक पहचान बनाने निकला हू,कही टुटा है एक तारा आसमान से मैं उसे चाँद बनाने निकला हू..... तो क्या हुआ जो जिंदगी हर कदम पर मारती है ठोकर,हर बार फिर संभलकर मैं उसे फिर एक अरमान बनाने निकला हू....... डूबता हुआ सूरज कहता है हर शाम मुझेसे की वो कल फिर आएगा ,मैं उसे कल के लिए एक आसमान बनाने निकला हू......... एक तारा टुटा है असमान मे मैं उसे चाँद बनाने निकला हू ............

कल हो न हो ......

आज एक बार सबसे मुस्करा के बात करो
बिताये हुये पलों को साथ साथ याद करो
क्या पता कल चेहरे को मुस्कुराना
और दिमाग को पुराने पल याद हो ना हो

आज एक बार फ़िर पुरानी बातो मे खो जाओ
आज एक बार फ़िर पुरानी यादो मे डूब जाओ
क्या पता कल ये बाते
और ये यादें हो ना हो

आज एक बार मन्दिर हो आओ
पुजा कर के प्रसाद भी चढाओ
क्या पता कल के कलयुग मे
भगवान पर लोगों की श्रद्धा हो ना हो

बारीश मे आज खुब भीगो
झुम झुम के बचपन की तरह नाचो
क्या पता बीते हुये बचपन की तरह
कल ये बारीश भी हो ना हो

आज हर काम खूब दिल लगा कर करो
उसे तय समय से पहले पुरा करो
क्या पता आज की तरह
कल बाजुओं मे ताकत हो ना हो

आज एक बार चैन की नीन्द सो जाओ
आज कोई अच्छा सा सपना भी देखो
क्या पता कल जिन्दगी मे चैन
और आखों मे कोई सपना हो ना हो

क्या पता
कल हो ना हो ....

गुरुवार, 20 मार्च 2008

गंगा का व्वयासयीकरण

आज हम वैघनिक उपलब्धियों एवम विकाश की चकाचौंध मी अपने मूल तत्त्व को भूल चुके हाई। उत्तर प्रदेश सरकार ने विकाश की दुहाई देते हुए , तिहरी बाँध मी कैद माँ गंगा के बाजारीकरण की योजना बना ली हाई उप सरकार का दावा हाई की नॉएडा से बलिया लगभग १ हजार किलो मीटर की गंगा एक्सप्रेस वे बनने के बाद प्रदेश के पूर्वी जिलो की तस्वीर बदल जायेगी परन्तु वही काशी हिंदू विशाव्विद्यालय द्वारा गंगा पर किए शोध के अनुसार इस परियोजना से न केवल गंगा का प्रदुषण बढेगा बल्कि गंगा बसीं की जलवायु पेर असर पड़ेगा तथा लगभग ५० लाख कुंतल अनाज की पैदावार कम होगी । रिपोर्ट मी कहा गया हई की एक्सप्रेस वे पेर चलने वाली गाडियों से लगातार कार्बन दाई ओक्सिदे , कार्बन मोनो ओक्सिद आदि जैसे नदी से निस्तारित होने वाली वाष्पीकरण की रफ़्तार को बढ़ा देगी जिससे जल मे ऑक्सिजन की मात्र घाट जायेगी , इसके अलावा एक्सप्रेस वे और गंगा के बीच की उपजाऊ जमीन गंगा का बसिन न रहकर बाढ़ खेत्र मे तब्दील हो जायेगी तथा हजारो एकड़ का गंगा उपजाऊ बसिन खेत्र नष्ट हो जाएगा और हम आने वाली पीढियों को गंगा की कहानी सुनते नजर आयेंगे । अभी भी समय हाई सँभालने का , अब तक हुए विनाश से सबक लेकर सादगी एवम संयम का जीवन अपनाकर तथा प्रकृति एवम मनुष्य के सम्बन्ध को पहचानकर ही मानव जाती इस स्वनिर्मित विनाश से बच सकती हाई और भविष्य मे उज्जवल भविष्य की सम्भावना साकार हो सकती हाई.